LORD VISHNU LAXMI

LORD VISHNU LAXMI

Sunday, May 13, 2012

साथी बोलो है क्या साहस ..........

कुछ लोग बहुत ज्यादा डरते है और इसके चलते हिम्मत छोड़ देते हैं और कूदने से पहले पसीना- पसीना हो जाते हैं, उनके हाथ पैर सुन्न होने लगते हैं और चूँकि वे अभी विमान के बोर्ड पर ही होते है, लिहाज़ा कूदने से मन कर देते हैं|दूसरी तरह के लोग निर्भीक होते हैं,कोई डर नहीं दिखाते,न पसीने से तरबतर होते हैं, न उनकी आवाज़ कपकपाती है| बहुत शांति के साथ हवा में छलांग लगा देते हैं,उन्हें इसमें कोई दिक्कत नहीं होती|तीसरी तरह के लोग कूदने से पहले डरे जरुर होते है ,लेकिन जब हवा में कूदने का समय आता है तो झिझकते नहीं.........जय कुमारEdit

जीवन की राह प्रभु की ओर|


बड़े शहरों को जोड़ने वाले हायवे में दो सड़कें होती है -एक आने की और दूसरी जाने की| बीच में हर १५-२० कि मी पर हायवे कि सोनो सड़कों के बीच एक कट आता है जहा से आप अपने वाहन को मोड़कर दिशा बदल सकते है ऐसे ही मानव जीवन में दो दिशाए है एक माया कि और दूसरी प्रभु की| माया की दिशा पर चलते हुए इसका अंत बहुत भयावह है लेकिन प्रभु मार्ग की दिशा पर चलते हुए मनुष्य प्रभु का ही होजाता है ---- कल्याण से साभार

अहंकार मन को कमजोर बनाता है|


जीवन एक शब्द नहीं है| यह एक वाक्य है| इसे  आजीवन कारावास मत बना लीजिये| जीवन जीने का अर्थ है जुड़ना,सम्बंधित होना| प्रत्येक सम्बन्ध के तीन पहलू हैं, सम्बन्ध बनाने वाला, सम्बंधित, सम्बन्ध | जब कोई सम्बन्ध समाप्त होता है, तो जीवन भी समरस होता है,वर्ना इसके विपरीत होता है|समरस होने की कला हमें धर्म सिखाती है -- स्वामी सुखबोधानन्द जी महाराज

Sunday, March 4, 2012

घर के बाहर नए आसमान की तलाश

धरती की कोख में रोपकर एक बीज हम मांगेंगे आकाश से, एक बूंद एक दाना ऐसा जो, भर
सके करोड़ों का पेट, भरपेट जो हो अपना, जिसके गर्भ से आती हो मुट्टी की गंध अपनी सी।
कभी राजस्थान की चौपालों पर बड़ा सा घूँघट काढ़कर एक कोने में बैठी महिला सरपंच मूकदर्शक
बनी पंचायत की कार्यवाही देखा करती थी,लेकिन अब ये बीते जमाने की बात हो गयी है।महिला
सरपंचों द्वारा उनकी पंचायत में किये गए कर्यों की चर्चा अब दूर-दूर तक है............गीता यादव

स्त्रियाँ तो बदलीं,क्या पुरुष भी..........

स्त्रियों में तो बदलाव आया है,लेकिन भारतीय पुरुष बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं,इसलिए यह कहना ठीक नहीं कि वो बदल गए हैं।वैसे, उनके विचारों और मान्यताओं में काफी परिवर्तन आये
हैं,अब वो ज्यादा संवेदनशील हैं।घर का काम करने में बेइज्जती नहीं समझते।बच्चों कि देखभाल करने करने में भी योगदान देते हैं..............भावना

सूरत पर लिखी कहानी

किसी संस्कृति को अगर समझना है सबसे आसान तरीका है कि आप उस संस्कृति में स्त्रियों के हालात समझने कि कोशिश करें।स्त्रियाँ समाज के सांस्कृतिक चेहरे का दर्पण होती हैं।अगर किसी देश में स्त्रियों का जीवन उन्मुक्त है तो इसका सीधा आशय यह निकल सकता है कि उस देश का समाज एक उन्मुक्त समाज है .......देवाशीष प्रसून

स्त्री स्वयं कला है

स्त्री है तो दुनिया में श्रृंगार बचा है, प्रेम का भाव बचा है,घृणा सिरनहीं उठा पाती, फिर भी अफ़सोस....
भ्रूण-हत्याएं बढती जा रहीं हैं।सबाल बस इतना है कि हम कैसा जीवन चाहते हैं? कैसी कुदरत चाहते हैं, जो स्त्री के बिना सोची जा रही है,मांगी जा रही है,हमारे द्वारा इच्छित है? .......अमिताभ

Sunday, February 5, 2012

भविष्य का ज्ञान

पल भर में ज्ञान व उसे हासिल करने का जरिया पुराना हो जाता है और उसका नया रूप जो
हमें देखने को मिलता है,वह प्राचीन को शामिल तो करता है, लेकिन अपने बाहरी स्वरूप में बिलकुल
अर्वाचीन रहता है।आज का ज्ञान मानव सभ्यता के हजारो साल से जमा होते ज्ञान के साथ इस जमाने की जरूरतों का आविर्भाव भी है...............देवाशीष प्रसून

Friday, February 3, 2012

पारे जैसा तरल भाव

किसी का गरम सामान्य और ठंडा होना उसके अलग-अलग रूप हैं और पारा इन अलग-अलग रूपं से सामंजस्य के लिए अपनी तरलता में बदलाव लता रहता है।ठीक इसी तरह मनोविज्ञान भी कम करता है। साहस, भय, क्रोध,दया प्रेम आदि मनोभावों का मूलभाव है-अपने अस्तित्व की रक्षा करने
का प्रयास करना और इसी प्रयास में कोई कायर निकल जाता है तो कोई साहसी.....देवाशीष प्रसून

डर के आगे जीत है -

हम सबके अपने भय हैं ,जो अलग अलग मनस्थितियों और परिस्थितियों से उपज सकते है| कई बार भय हमारी इच्छाओं से पैदा होते है, कई बार बचपन की कुछ स्मृतियों से, तो कई बार हमारी कमजोरियों से भी,लेकिन सबसे बड़ा सत्य यह है कि कभी न कभी हमारा डर हमारे सामने साक्षात आकर खड़ा हो जाता है .........मयंक